कभी नहीं हारती, और नाम है कमांडो 'ग्रीन कमांडो'

S.Khan July 17, 2017 
कमांडो! इस शब्द को सुनकर बहादुर, निडर, दृढ़ निश्चयी आदि अद्वितीय गुणों से संपन्न व्यक्ति का ख्याल आता है। जेहन में किसी शानदार यूनिफॉर्म में कठोर और गठीले शरीर वाले लंबे चौड़े शख्स की छवि बन जाती है। अधिकतर लोग इस शब्द से और इसके वास्तविक रूप से परिचित ही होंगे। देेेश विदेेेश में कई तरह के कमांडो होते हैं। इनमें ब्लैक कमांडो तो बहुत मशहूर हैं। लेकिन, कुछ कमांडो ऐसे भी हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। और ये पारंपरिक कमांडोज से बिलकुल अलग तरह के होते हैं। इनकी टीम में ज्यादातर महिलाएं होती हैं। जिनमें लोगों की सेवा के प्रति जज्बा कूट-कूट कर भरा होता है। और इन्हें ग्रीन कमांडोज कहा जाता है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कभी भी पीछे नहीं हटतीं।


ग्रीन कमांडोज के कंधे पर लगभग 10 किलो का भारी सामान। आराम या खाने की कोई खास इंतजमा नहीं। जहां जगह मिली, वहीं पेड़ के नीचे भोजन। थोड़ी देर विश्राम। फिर ऊंची पहाडिय़ों की चढ़ाई। पहाडिय़ों पर मौजूद जंगलों से गुजरते हुए चोटी पर पहुंची हैं। फिर वहां मौजूद, इक्का दुक्का फलियों (मोहल्ला) में कच्चे मकानों की तरफ कूच कर जाती हैं। कच्चे मकानों में जहां भी बच्चे मिले उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया। टीके लगाए। एक बच्चे के टीके एवं सेहत जांचने के लिए ये कई-कई किमी तक पहाडिय़ों पर पैदल ही जाती हैं। थकान से चूर होने के बाद भी ये अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से कभी नहीं चुकती हैं। तभी तो इन्हें ग्रीन कमांडों के नाम से नवाजा गया है। मप्र के बड़वानी जिले में पहाड़ी क्षेत्रों की बहुलता है। एक गांव में मोहल्ले भी एक दूसरे से कई-कई किमी दूर-दूर पहाडिय़ों पर बसे होते हैं। कई पहाडिय़ों पर तो सिर्फ एक घर बसा रहता है। फिर भी वहां तक पहुंचने से ग्रीन कमांडो कभी पीछे नहीं हटती हैं। एक घर के लिए भी पहाडिय़ों की चोटियों तक पहुंचती हैं। 

पहाड़ी अंचल में टीकाकरण अभियान हमेशा से काफी मुश्किल भरा रहा है। एएनएम (Auxiliary Nurse Midwifery) को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनकी हरी यूनीफॉर्म की वजह से ही इनका नाम ग्रीन कमांडो पड़ा। स्वयं बड़वानी के कलेक्टर ने इन एएनएम को ग्रीन कमांडो नाम दिया है। कमांडो की तरह जूझने और रक्षा के लिए दृढ़ निश्चयी होती हैं ग्रीन कमांडो। ऊंची नीची पहाडिय़ों पर चढऩा, जंगलों के बीच से होकर गुजरना, प्रतिदिन कई-कई किमी पैदल चलना, भूख, प्यास, थकान सहना। फिर भी ये ग्रीन कमांडो सौ प्रतिशत टीकाकरण लक्ष्य को हासिल करने के अपने मिशन में कामयाब रहीं। पहाड़ी क्षेत्र चुनौतियों भरा था। लक्ष्य आसान नहीं था। वन रक्षकों की टीम ने भी सहयोग किया। एएनएम (ग्रीन कमांडो) बीमारियों को फैलने से रोक रहीं हैं। इसलिए उन्हें ग्रीन कमांडो की उपाधि दी गई। बारिश व ठंड में 15-15 किमी दूरी पर स्थित ऊंची पहाडिय़ां भी इनका हौसला डिगा नहीं पाई। मिशन के दौरान रोज 50 किमी पैदल सफर किया।  

सरदार सरोवर डूब प्रभावित ग्रामों में भी विशेष अभियान चल रहा है। एएनएम सौंपे गए प्रभार के गांव के हर व्यक्ति का स्वास्थ्य परीक्षण घर-घर पहुंचकर कर रही हैं। इस दौरान किसी को कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या ज्ञात होती है तो उन्हें उचित सलाह भी दे रही हैं। प्रत्येक ग्रीन कमाडो (एएनएम) के कार्यों का आकलन के अनुसार बैच देकर सम्मानित किया जाता है। मालूम हो, ग्रीन कमांडो को उनके कार्यों के आंकलन के आधार पर 100 नंबर, 500 नंबर, 1000 नंबर के बैच देकर सम्मानित कर उनकी हौसला अफजाई की जाती है। 


खैर, इन ग्रीन कमांडों की मेहनत एवं सेवा भाव के चलते गांव-गांव स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच रही हैं। लोगों की सूहलियत बढ़ रही है। लेकिन हर जगह ऐसी व्यवस्था नहीं है। मैने तो अपने गांव (उप्र का एक गांव) में कभी किसी चिकित्सक, एएनएम, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, नर्स या किसी भी स्वास्थ्यकर्मी को आज तक नहीं देखा है। हां, एक स्वास्थ्य केंद्र बना है। गांव के बाहर। गुलाबी रंग का यह भवन अक्सर बारिश के पानी में भीगकर चितकबरा ही दिखाई पड़ता है। दरवाजे टूटे हैं। कभी किसी को उसके अंदर आते जाते नहीं देखा। भवन निर्माण के समय ही कोई वहां गया हो। हां, अक्सर उसमें मवेशियों का चारा वगैरह रखा जरूर मिलता है। गांव के बाहर मौजूद स्वास्थ्य केंद्र भी कभी किसी के नहीं आने पर अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित ही ज्यादा रहता होगा। खेलते-खेलते कभी कभार बच्चों को अपनी ओर आते देख जरूर मन बहला लेता होगा। फिर उनके गुजरने के बाद हमेशा की तरह दोबारा मायूस ही बैठ जाता होगा। वह क्यों है सोचता होगा।

बहरहाल, जितनी स्वास्थ्य सेवाएं लोगों को मिलनी चाहिए। आज तक मिली नहीं हैं। अस्पताल हैं, तो चिकित्सक नहीं। और हैं, भी तो ग्रामीण क्षेत्रों में कभी दिखते नहीं। खामियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है। लोग भी इन व्यवस्थाओं के न मिलने पर कोई खासे चिंतित तो नजर आते नहीं है। फिर नेताजी या बड़े अफसर भी इसके बारे में क्यों सोचे। वोट मिल ही रहा है। चापलूसों की भरमार है। हर कोई इसे अब शान समझने लगा है। स्वार्थी किस्म के लोग अपने वारे न्यारे कर रहे हैं। गरीब बेचारा मारा जा रहा है। आखिर इन सुविधाओं की सबसे ज्यादा जरूरत तो उन्हीं को ही है। छुटभैये नेता (चापलूस) कभी कभार अपने वरिष्ठ नेताजी के नाम पर कुछ मदद भी कर देते हैं। फिर छुटभय्ये नेताओं के ईद गिर्द रहने वाले कई छोटे मोटे स्थानीय स्तर के (एक दो मोहल्ले के) नेता भी जय-जयकार कर देते हैं। मूल समस्या जस की तस ही रहती है। अबतक तो यही हो रहा है। 

होना तो ये चाहिए कि गांव हो या शहर हर जगह स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होनी चाहिए। चिकित्सक न सही तो कम से कम वॉर्ड ब्वॉय, एएनएम ही तैनात कर दें। कबतक स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ भूंसा ही रखा जाएगा। भूंसा हटाकर कुछ दवाएं ही रख देना चाहिए। गरीबों को फायदा होगा। अभी भी छोटी मोटी बीमारी के लिए बड़े शहरों की तरफ जाना मजबूरी बना हुआ है। जबकि हम बात कर रहे हैं डिजिटल युग की न्यू इंडिया की। जिनके पास बड़े शहर जाने या इलाज कराने की सुविधा है, रकम है, उन्हें कुछ परेशानी उठाकर इलाज मिल ही जाता है। लेकिन, जिनके पास संसाधन नहीं है, उन्हें बीमारीग्रस्त होकर जीवन जीना पड़ता है या किसी झोलाछाप से अपना उपचार कराना पड़ता है। जोखिम तो दोनों में ही रहता है। पर, गांव का गरीब कर भी क्या सकता है। नागरिकों की गाढ़ी कमाई शायद किन्हीं अयोग्य के हिस्से ही जा रही है। संसाधन हैं नहीं। योजनाएं बन रही हैं। मुफ्त इलाज की सुविधा है। लेकिन सुविधा कहां है, कितनी दूर है, आप ही सोचें।

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