अद्वितीय संस्कृति व सामाजिक परंपरा

S.Khan March 06, 2017 
पिछले कुछ दिनों से कई जगहों पर चल रहे चुनाव, इससे जुड़ी बातों व खबरों सहित कई चर्चाओं और वाद-विवाद पर ही लोगों का ध्यान ज्यादा केंद्रित है। अभी भी कई मुद्दे खबरों में बने ही हुए हैं। रोज लंबी चौड़ी बहस भी सुनने को मिल रही हैं। इन चीजों से थोड़ा बोर होकर मैं गांवों की ओर निकल पड़ा। रोज-रोज की बातों से दूर था। गांवों में विशेष बाजार लगे थे, जो आज ही शुरू हुए थे। ये भोंगर्या हाट के नाम से मशहूर हैं। आदिवासी समाज के लोग हाट में होली पर्व के लिए खरीदी करते हैं।



सुबह जब नींद खुली तो पास में ही दो अख़बार पड़े हुए थे, जिसे अख़बार वाला मेरे रूम में रोज रख जाता था। पहली खबर जिसपर मेरी नजर पड़ी वो ये थी कि अमरीका में फिर से भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक को अज्ञात हमलावर ने गोली मारकर घायल कर दिया। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद इस तरह की नस्लीय हिंसा अभी भी जारी हैं। जैसा कि खबरों में लिखा गया था। ऐसी घटनाओं पर तत्काल रोक लगाने की जरूरत है। इसी तरह दूसरे अखबार में चुनाव से जुड़ी कुछ खबरें भी थी।

अन्य समाचार भी थे जो आज कल मीडिया, सोशल साइट्स पर खूब छाए हुए हैं। जैसे रामजस कॉलेज मामला और इससे जुड़ी अन्य बातें। नस्लीय हमले, बेवजह के विवाद की खबरों को पढ़कर बस यही सोचने लगा कि कब ये सब थमेगा। फिर क्या था। अशांत मन को शांत वातावरण और माहौल की अभिलाषा जगी। और मैं तैयार होकर निकल पड़ा देहात की तरफ। मन की इच्छा भी शीघ्र ही पूरी हो गई। एक गांव में भीड़ नजर आई। वहां लोग ख़ुशी मनाते और हंसते खिलखिलाते मिले।

पता चला कि यहां साल में एक बार लगने वाला विशेष बाजार लगा है, जिसे भोंगर्या हाट कहते हैं। यहां मांदल (एक प्रकार का बड़ा ढोलक) की थाप पर आदिवासी लोक नृत्य होते भी दिखा। जो देखते ही बन रहा था। इसकी छटा भी खूब निराली प्रतीत हुई। वहीं, हाथों में बांसुरी लिए युवाओं की टोली भी एक रंग में नजर आ रही थी। जो बांसुरी की मधुर धुन से सबका ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे। मांदल की थाप व बांसूरी की धुन पर हो रहे मनमोहक नृत्य पर मानो आंखे टिकी सी रह गईं।

रंग बिरंगे परिधानों से सजे धजे लोग हाट की रौनक में चार चांद लगा रहे थे। कई युवा तो एक रंग के परिधानों में पहुंचे थे। जो आकर्षण का केंद्र बने हुए नजर आए। हाट में मिठाइयों की दुकानें थी, झूले आदि भी लगे थे। मिठाइयों में जलेबी भी खास थी, जिसके बिना हाट शायद अधूरा ही होता। जलेबी पसंद करने वाले अब कम ही बचे हैं। ब्रांडेड चॉकलेट, टॉफी ने इनके स्थान ले लिए हैं। लेकिन यहां पर जलेबी खूब पसंद की जा रही थी। लोग भी खूब चाव से इसकी खरीदी कर रहे थे और मित्रों एवं करीबियों के साथ इसके स्वाद का लुत्फ उठा रहे थे।

खजूर की भी खूब डिमांड नजर आई। जगह-जगह खजूर की दुकानें लगी थी। जहां बच्चों से लेकर बूढ़े तक खरीदी करते दिखे। हाट आम हाट से हटकर लग रहा था। यहां एक अनमोल संस्कृति भी झलक रही थी, जो आज भी असंख्य लोगों की नजरों से दूर ही है। अक्सर सुविधाओं की कमी वाले क्षेत्रों, जंगल, पहाडिय़ों के बीच अपना जीवन सादगी से गुजारने वाले लोग हाट में उमंग से भरे नजर आए। क्या बड़ा, क्या छोटा सभी मित्रों के साथ खुशियां मनाते दिखे। मांदल की थाप, बांसूरी की धुन, लोकनृत्य, पारंपरिक परिधान मनोरम छटा बिखेर रहे थे।

एक शानदार संस्कृति के बीच कुछ वक्त गुजारकर रोज की व्यस्त व तनाव भरी दिनचर्या से कुछ छुटकारा मिला। ऐसी आकर्षक संस्कृति को देखना होतो मप्र के निमाड़ आ जाएं। मैं तो यही कहूंगा। यहां लोग भी भोले हैं और परंपरा व संस्कृति भी अद्वितीय हैं। भोंगर्या हाट है क्या? और इसके आयोजन के संबंध में जानकारी लेने की इच्छा हुई। थोड़ी बुहत जानकारी इस क्षेत्र में रहते हुए मुझे पहले से ही मालूम थी। फिर भी और जानकारी लेने में कोई हर्ज नहीं था।

इसका अंदाजा भी था कि जानकारी कहां से मिल सकती है। कई संगठन अपने समुदाय के विकास के लिए कार्य करते ही हैं। कुछ का मुझे पता भी था, जहां से भोंगर्या के बारे में कुछ अहम बातों की जानकारी भी मिल गई। एक संगठन भोंगर्या हाट को लेकर लोगों को जागरूक करता भी मिला। जागरुकता के लिए पम्पलेट व अन्य माध्यमों का भी उपयोग किया जा रहा था। एक पम्पलेट मुझे भी मिल गया। इसके मुताबिक यह अवसर साप्ताहिक बाजार या सामान्य तौर पर एक दूसरे से मिलने का भी हो सकता है।

यह एक शुद्ध सामाजिक परंपरा है। भोंगर्या हाट का महत्व इसलिए भी है कि इस बाजार में होलिका पूजन सामग्री जैसे, भुगड़े, दाली, गुड़, कंगन, खजूर, नारियल, गुलाल आदि की खरीदी की जाती है। पम्पलेट में साफ कहा गया है कि इस हाट का महत्व सिर्फ आदिवासी समाज के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी समाजों के लिए है, जो होली का पर्व मनाते हैं। कई ऐसी बातें जो मुझे नहीं मालूम थी, पता चलीं। जानकारी लेने की उत्सुक्ता बढ़ती ही गई।

इस दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि होलिका दहन के बाद फाग मनाने की परंपरा आदिवासी समाज में भी है। अलग-अलग गांव का दल बनता है, जिसे गेहर खेलना बोलते हैं। यह गेहर तीन दिन, पांच दिन या सात दिन तक अलग-अलग गांवों में जाकर फाग मांगती हैं। इसमें अलग-अलग वेशभूषा में लोग प्रत्येक घर के सामने जाकर ढोल मांदल के साथ में नृत्य भी करते हैं। और इसके बाद फाग के रूप में नकदी या अनाज प्राप्त करते हैं। गेहर के दल में राहवी, काली व बुडला होते हैं, जो अपनी भाषा में बोलते हैं कि मारू भोंगर्यू आपदे अर्थात मेरा भोंगर्या दे दो।

तब उस घर का सदस्य उन्हें गुड़, दाली, भुगड़ा, कंगन, खजूर आदि देता है। पम्पलेट में यह भी बताया गया था कि भोंगर्या शब्द का वास्तविक अर्थ होलिका पूजन सामग्री ही होती है। भोंगर्या हाट में आदिवासी समाज के लोग ज्यादा एकत्रित होते हैं। क्योंकि पुराने समय में बाजार करने के लिए सिर्फ घर का मुखिया ही जाता था। लेकिन भोंगर्या हाट जिस समय आता था, उस समय तक खेती के सारे कामकाज निपट जाते थे। समाज के अधिकतर लोग किसान या खेतिहर मजदूर होते हैं।

इसलिए इस हाट में घर के सभी सदस्यों के जाने की छूट होती थी। इसी बहाने सारे नाते रिश्तेदारों से मुलाकात हो जाती थी। क्योंकि पुराने समय में न तो आज की तरह आवागमन के साधन थे और न ही संचार के ही साधन थे। इससे कई कई दिनों तक लोगों की मुलाकात नहीं हो पाती थी, न ही कोई खबर मिल पाती थी। यह भी कहा गया कि, आज के समय में इसकी कितनी प्रासंगिकता है, यह सोचने एवं समझने की बात है। आज के समय में वाहन एवं मोबाइल की सुविधा है।

इससे रोज नहीं तो सप्ताह में एक बार तो सगे सम्बन्धियों से मुलाकात हो ही जाती है। अर्थात भोंगर्या हाट का महत्व सिर्फ होलिका पूजन सामग्री खरीदी करने का ही रह गया है। हाट में जो नृत्य नजर आया था। इसके बारे में पता चला कि यह आदिवासी नृत्य ही है। यह खास नृत्य सिर्फ भोंगर्या हाट में ही नहीं बल्कि यह सामान्य तौर पर भी किया जाता है। गौरतलब है, भोंगर्या हाट को लेकर न सिर्फ स्थानीय बल्कि दूर दराज के नगरों एवं राज्यों में भी विशेष उत्सुक्ता रहती है।

खैर, हाट में जो संस्कृति दिखी वह मेरे लिए यादगार बन गईं। सादगी से भरे रहने वाले मेले में अब फोटो स्टूडियो, आइस्क्रीम व झूले इत्यादि भी दिखते हैं। लोगों के बीच जो समय गुजरा, वह शायद किसी शॉपिंग काम्पलेक्स में गुजारे वक्त से बेहतर लगा। हर वर्ष होली से पहले इस हाट का आयोजन हर्षाेल्लास से होता है। जहां आदिवासी संस्कृति, कला, संगीत, गीत, वेशभूषा, परंपरा सब एक जगह मिल जाती हैं। शाम को हाट के भ्रमण से मैं वापस शहर की चकाचौंध में लौट आया। और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। पर, जो क्षण हाट में गुजरे, वे न भूलने वाले बन गए।

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