आज भी होता है मेले का इंतजार

S.Khan February 16, 2017 
मेला। यह शब्द बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को बखूबी याद रहता है। मेले को लेकर हमें हमेशा इंतजार रहता है। आज के इंटरनेट युग में भी मेले ने अपना वजूद बनाए रखा है। हर वर्ष हर शहर में कई मेले लगते ही हैं। मेले में भीड़ भी खूब उमड़ती है। हालांकि अब इसमें थोड़ी कमी भी आती जा रही है। पूर्व में मेले का बड़ा बेसब्री से प्रतीक्षा किया जाता था। मेला अपने साथ खुशियां तो लाता ही था, बच्चों के लिए छुट्टियां भी साथ लाता था।


कई त्योहारों पर मेला आयोजित करने की परंपरा आज भी बनी हुई है। कहीं-कहीं तो मेला बीस से तीस दिन तक चलते हैं। मेले के दौरान का नजारा किसी पर्व से कम नहीं होता। यहां सभी लोग बिना भेदभाव के एक साथ जमा होते हैं और मेले का खूब लुत्फ उठाते हैं। बच्चों के लिए तो मेला किसी उपहार से कम नहीं है। हो भी क्यों न। मेले में बच्चों के लिए खिलौने, मिठाइयां, झूले सब एक साथ मिल जाते हैं। अभिभावक भी मेले में बच्चों को ले जाना नहीं भूलते। कभी मेले को लेकर उत्साह इतना होता था कि लोग छुट्टियां लेकर पहुंचते थे।

दूर दराज के शहरों में रहने वाले भी अपने गांवों में लगने वाले मेले को खूब महत्व देते थे। एक दिन का ही मेला सही, लेकिन जो आनंद मित्रों के साथ मेले में घूमने का होता था, वह अकल्पनीय ही था। युवा तो कई दिनों पहले से ही मेले में जाने की योजनाएं बनाने लगते। मेले में मिठाई खाने, नाटक देखने, बच्चों के लिए तरह-तरह के खिलौने, आकाश को छूते झूले, फिल्में आदि उन्हें खूब आकर्षित करता था।

मेले की सुबह तो बस एक दूसरे से यही पूछते कि कब निकलना है। जवाब भी कुछ ऐसा होता था कि बस अभी चलते हैं। पल भर में सभी मित्र तैयार होकर एक साथ मेले के लिए निकल पड़ते थे। गांवों में तो मेले का स्थान अक्सर थोड़ी दूरी पर होता था। लेकिन यह दूरी बस एक कदम ही महसूस होती थी। चहकते हुए कदम मेले की तरफ बढ़ा देते थे। मेले में पहुंचकर पहले पूरा मेला घूमकर देखा जाता था। कहां-कहां पर क्या-क्या है। इसका पता लगाया जाता था। फिर थोड़ी देर रुककर मिठाई, समोसे व अन्य व्यंजनों से पेट पूजा की जाती थी। पेट पूजा के बाद फिर से किसी एक स्थान पर चलने की योजना बनती थी। चाहे वह फिल्म देखना हो या फिर मेले मेें मिल रहीं चीजों को खरीदना हो।

युवाओं की टोली खुशी से फूले नहीं समाती थी। बात जब मेले में फिल्म देखने की आती थी तो, टिकट कैसे मिलेगा, इसको लेकर खूब चर्चा होती थी। टोली में से किसी एक युवा को जो, भीड़ से जूझने में माहिर हो उसे टिकट कटाने की जिम्मेदारी दे दी जाती थी। वह भी बड़े उत्साह से टिकट की लंबी लाइन या भीड़ में प्रवेश कर जाता था। किसी जंग से कम नहीं होता था मेले के दौरान फिल्म का टिकट कटाना। बस क्या फिर टिकट मिलने की खुशखबरी सुनने को बाकी दोस्त इंतजार करने लगते। देर होने पर सब यही कहते, लगता है टिकट नहीं मिल रहा। भीड़ से जब हांफते और टिकट के अन्य दावेदारों को पीछे धकेलते हुए टिकट कटाने वाले विशेषज्ञ के दर्शन होते तो इंतजार करते मित्रों की जिज्ञासा बढ़ जाती। कई दफा तो टिकट कटाने वाले के कपड़े तक फट फुटा जाते थे।

टिकट कटाने वाला भी थोड़ी निराशा दर्शाकर जिज्ञासा को और बढ़ा देता था। लेकिन ज्यादा देर तक नहीं। जैसे ही टिकट मिलने की खबर सुनने को मिलता था, युवा तो बस झूम उठते थे, मानों कि मनोकामना पूरी हो गई। फिल्म देखने के बाद फिर से मेले का एक चक्कर लगाकर कुछ खाया पीया या खरीदारी की जाती थी। कुछ मिठाइयां घर के लिए भी ले लिए जाते थे। बहरहाल, यह बात और आनंद अब भला कहां देखने को मिलता है। कई दफा घर के करीब मेला लगने पर भी लोग नहीं पहुंच पाते। फिर भी मेले ने अपनी अहमियत बनाए रखी है। तभी तो हर मेले में शाम को भीड़ इतनी उमड़ती है कि पूरे मेला परिसर में बस सिर ही सिर दिखाई पड़ते हैं। मेले के आयोजन के स्वरूप भी अब थोड़े बदलने लगे हैं। मेले के सफल आयोजन के लिए तरह-तरह के उपाए किए जाने लगे हैं।

इवेंट मैनेजर तक नियुक्त होते हैं। अब मेले में छोटी बड़ी हर चीज की दुकानें सजाई जाती हैं। साज सज्जा का खूब खयाल रखा जाता है। रात के समय रंग बिरंगी रोशनी से जगमगाता मेले का दृश्य तो खूब भाता है। जहां मनोरंजन के लिए कई शो भी आयोजित होते हैं। इसमें मैजिक शो, बाइक चलाना, कार चलाना आदि प्रमुख हैं। जिन स्थानों पर मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं है, वहां मेले खूब पसंद किए जाते हैं। ग्रामीणों के लिए तो मेला किसी त्योहार से कम नहीं होता। जहां वे कई दफा सपरिवार पहुंचते हैं। उनके साथ आए बच्चे तो मेले में पहुंचते ही खुशी से झूम उठते हैं। छोटे बड़े शहरों में आज भी मेले को लेकर उत्साह बना ही रहता है। वर्ष भर समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। कइयों के लिए मेले अमिट यादें भी साथ छोड़ जाते हैं।

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