नजीब कहां है ?

S.Khan February 25, 2017 

जेएनयू का छात्र नजीब अहमद कहां है? आज यह सवाल हर नौजवान के जुबां पर है। 5 महीने से ज्यादा का समय गुजर गया नजीब को लापता हुए। मालूम हो,15 अक्टूबर की रात से नजीब हॉस्टल से लापता चल रहा है। नजीब का इतने दिनों में कोई सुराग तक नहीं मिल सका है। नजीब के परिजन हर दिन नजीब की तलाश में दर-दर गुहार लगा रहे हैं। जिम्मेदारों के बेरुखी से भरे रवैये के बाद भी इनकी हिम्मत ने हार नहीं मानी है। परिजनों के अलावा युवा भी नजीब के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। ये दौर बिना रुके आज भी लगातार जारी है। कई जगह कैम्पेन भी अनवरत चल रहे हैं। जो नजीब को ढूंढ कर ही दम लेंगे। ऐसा ही लगता है। हर युवा इस मुहीम में एक साथ खड़ा नजर आ रहा है। नौजवानों की ही कोशिश और ताकत है कि सभी को नजीब और इससे जुड़ी पीड़ादायक घटना का ज्ञान है।



एक मां अपने बेटे का चेहरा देखने के लिए महीनों से ठोकरें खा रही है। लेकिन जिम्मेदार इतने दिनों में कोई सकारात्मक जवाब तक नहीं दे सके। कैसे नजीब लापता हो गया, क्यों ऐसा हुआ, नजीब कहां है, इसके पीछे क्या वजह रही? इन सारे सवालों के जवाब पहले दिन की ही तरह आज भी रहस्मय बने हुए हैं, या शायद बना दिए गए हैं। जांच में वक्त लगता है। सभी इस बात को मानते हैं। इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। पर अब तो 5 माह  से ज्यादा का समय बीत चुका है।

और नतीजा शून्य ही बना हुआ है। वाह रे पड़ताल। ऐसे में पड़ताल पर सवाल तो होंगे ही। नजीब की तलाश यूं ही थक हार कर खत्म नहीं होने वाली। क्योंकि नौजवानों ने भी ये बीड़ा अपने कंधों पर उठाई हुई है। मेन स्ट्रीम मीडिया में नजीब को लेकर न्यूज़ भले ही कम दिखे या दिखाया जाए। लेकिन वर्तमान में सोशल मीडिया की ताकत और पहुंच इससे कम तो नहीं ही है। जो बन्द हो चुके कुछ कानों तक अपनी आवाज की गूंज पहुंचा ही देंगी। नजीब का मुद्दा या मसला सिर्फ नजीब के लिए ही नहीं है।

कल को हमारे  या हमारे घर परिवार के किसी सदस्य के साथ भी इस प्रकार की घटनाएं हो सकती हैं। ऐसे में इस मुहीम का अंजाम तक पहुंचना जरूरी लगता है। जवाबदेही भी तय करनी होगी। ताकि भविष्य में फिर ऐसी घटनाएं न हो सकें। फिलहाल नजीब की तलाश के प्रयास जारी हैं। ऐसा कहा जाता है। तलाश जारी है तो, अबतक क्या नतीजे आए। कुछ भी स्पष्ट प्रतीत नहीं होता।

हर रोज नजीब के लिए सोशल मीडिया पर आवाज बुलंद की जा रही है। हर पोस्ट में नजीब कहां है? का सवाल खड़ा रहता है। साथ में सिस्टम को कोसते हुए भी कई वाक्य या शब्द पढ़ने, देखने और सुनने को मिलते हैं। पोस्ट्स के रूप, स्वरूप, तस्वीर भले ही बदलते रहते हों, लेकिन सवाल वही रहता है कि नजीब कहां है? सिस्टम के अंगों का ऐसा कोई दरवाजा शायद ही बचा होगा, जहां नजीब कहां है?

इस सवाल के जवाब के लिए गुहार न लगाई गई हो। पर हर जगह मौन और ख़ामोशी ही ज्यादा सुनने को मिली हैं। तभी तो ये सवाल आज भी खड़ा है कि नजीब कहां है? आखिर इस तरह के हालात क्यों बन रहे हैं। इसपर सोच विचार की भी जरूरत है। आम आदमी न्याय के लिए दर दर भटक रहा है। युवा सड़कों पर हैं। ऐसा कबतक चलता रहेगा। वक्त निकाल कर गौर से सोचिएगा जरा।

इधर... बढ़ती नस्लीयता
बहरहाल, अब बात उन दो भारतीय नौजवानों की करते हैं, जिन्हें अमरीका में पिछले बुधवार की रात गोली मार दी गई। इनमें से एक श्रीनिवास कुचिवोतला की मौत हो गई। जबकि उनके मित्र आलोक मदसानी घायल हैं। इस दौरान बीच बचाव कर रहे एक अमरीकी इयान ग्रिलोट को भी हमलावर ने गोली मार कर घायल कर दिया। गोली मारने वाला आरोपी एडम पुरीनटोन रिटायर्ड अमरीकी नौसैनिक है, जो गिरफ्तार हो चुका है। वहीं उसके खिलाफ रिपोर्ट हत्या और हत्या के प्रयास का ही दर्ज हुआ है, जैसा की खबरों में बताया गया है।

लेकिन, यह हमला एक नस्लीय हमला भी माना जा रहा है, जोकि हालफिलहाल अमरीका में और बढ़ता ही प्रतीत हो रहा है। कबतक इस तरह की अमानवीय और इंसानियत के खिलाफ होने वाली घटनाएं घटती रहेंगी। एक बेवजह की जिद ने बेगुनाह की जान ले ली। इस तरह की सोच को आखिर बढ़ावा कहां से मिलता है, जो बेगुनाहों का कत्ल तक करने को विवश कर दे। कल तक तो वहां ऐसा न था। था भी तो बहुत कम था। नफा नुकसान इंसान की जान की कीमत के आगे तुच्छ भर हैं।

भारतीयों ने उस मुल्क की तरक्की में महती योगदान दिया है। बदले में उस मुल्क ने भी पलकों पर बिठाया है। लेकिन आज की स्थिति अच्छी तो नहीं ही लगती हैं। ऐसी घटनाएं और नस्लीय हमले बिना देर किए रोके जाने चाहिए। इस प्रकार की वारदातों की आशंका को देखते हुए प्रवासियों की सुरक्षा के भी बेहतर बन्दोबस्त होने चाहिए। खून खराबा और भेदभाव की खतरनाक सोच को समाप्त करना होगा। अवसरों की भूमि में ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए।

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