अभावों में हुनर तराश रहे नौजवान

S.Khan February 09, 2017 
हम सभी का बचपन सामान्यत: खेलकूद कर ही बीतता है। मित्रों संग जब भी दिन में वक्त मिलता खेलकूद का खूब लुत्फ उठाते थे। आज भी पार्कों या खेल मैदानों में बच्चे एवं युवा खेलकूद का आनंद लेते नजर आते हैं। बचपन में स्कूल से लौटते ही खेलने के लिए दौड़ जाया करते थे। कई दफा सूरज डूबने तक हम खेलने कूदने में व्यस्त रहते थे। घर लौटकर तो पलकें अपने आप नींद से बंद होने लगती थीं। खेलकूद के प्रति बचपन से ही हममे खूब शौक रहता है। लेकिन यह अक्सर युवावस्था तक ही कायम रहता है।




खलते हैं कम संसाधन
करियर की जिम्मेदारी। फिर पढ़ाई की जिम्मेदारी। इसे ही हम प्राथमिका देने लगते हैं। खेलकूद को भी करियर बनाया जा सकता है। पर संसाधनों का अभाव व ज्यादा स्कोप नहीं दिखने की वजह से हम इससे दूर ही होते चले जाते हैं। हां, शौक बना रहता है। युवा आज खेलकूद को लेकर सकारात्मक तो हैं, लेकिन पर्याप्त संसाधनों की कमी खलती है। खेलकूद के लिए अभी भी बड़े शहरों की तुलना में छोटे नगर एवं कस्बों में सुविधाएं कम ही हैं। गांवों में न के बराबर ही हैं। जबकि इन्हीं स्थानों पर ज्यादा आबादी रहती है। जो शहरी चकाचौंध एवं मनोरंजन के साधनों की कमी के चलते खेलकूद को ज्यादा महत्व देते हैं। इसपर भी छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खेलकूद के पर्याप्त साधन नहीं हैं।

कंकड़ पत्थर वाले मैदान
स्कूल स्तर पर भले ही खेलने कूदने की व्यवस्था कराई जाती है। वह भी अधिकतर 10वीं एवं 12वीं स्तर के स्कूलों में। हालांकि नामी निजी स्कूलों में खेलकूद की सुविधाएं बेहतर होती हैं। ऐसे में खेलकूद के लिए सभी को एक बराबर संसाधन नहीं मिल पाता है। महाविद्यालय स्तर पर खेलकूद की सुविधाएं कुछ बेहतर हैं, लेकिन यह भी बड़े नगरों तक ही सीमित हैं। छोटे शहरों में खेल के मैदान तो होते है, लेकिन मैदान के नाम पर कंकड़ पत्थर वाले स्थान ही ज्यादा मिलते हैं। फिर भी खेलकूद के प्रति रुचि रखने वाले खिलाड़ी इन्हीं परिस्थितियों में अपना हुनर तराशते हैं। कई दफा छोटे नगरों से ही बड़े खिलाड़ी बनते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति अच्छी नहीं दिखती है। कई जगह खेतों को ही मैदान के रूप में उपयोग किया जाता है। जो फसल लगाने के सीजन में समाप्त हो जाता है।





कई खेल यहां हैं प्रसिद्ध
क्रिकेट, फुटबाल, वॉलीबाल, टेनिस, टेबल टेनिस, खो-खो, कबड्डी, डॉस बॉल आदि खेल यहां प्रसिद्ध हैं। क्रिकेट को लेकर तो काफी दीवानगी है। खेल के मैदानों से लेकर गली मोहल्लों एवं सड़कों तक पर क्रिकेट खेलने वाले मिल जाएंगे। वहीं अधिकतर स्कूलों में अभी भी वॉलीबाल मैच को लेकर रुचि ज्यादा है। हर कॉलेज में वॉलीवाल मैच के आयोजन होते हैं। इसे देखने के लिए भीड़ भी उमड़ती है। खो-खो एवं कबड्डी भी स्कूल, कॉलेज में खूब ख्याति रखते हैं। क्रिकेट की तुलना में ये खेल ज्यादा ही खेले जाते हैं। इसपर भी क्रिकेट ने लोकप्रियता में सबको पीछे छोड़ दिया है। बचपन में भी हम क्रिकेट ही पसंद करने लगे हैं। नाम, शोहरत, लोकप्रियता सभी इसमें मिलते हैं। बाकि खेलों में ऐसा कम है।





सुविधाएं बढ़ाने की दरकार
खेलकूद की सुविधाएं बढ़ाने की दरकार है। कस्बों व ग्रामीण क्षेत्रों मेें स्टेडियम बने तो सुविधा मिले। अक्सर निर्माण की योजनाएं बनती हैं। लेकिन अमल काफी देरी से होती है। कंकड भरे मैदानों में ही धावक को दौडऩे की प्रेक्टिस करनी पड़ती है। बिना ट्रैक के ही चक्कर काटने पड़ते हैं। बावजूद इसके कइयों ने इन्ही परिस्थितियों में खुद को बेहतर खिलाड़ी बनाया है। जरूरी संसाधन एवं मार्गदर्शन मिले तो क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में भी बेहतर खिलाड़ी बनाए जा सकते हैं। दरकार है तो बस सही व समय पर कदम उठाने का।

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