S.Khan March 04, 2017
करीब हर शख्स गांव शब्द से वाकिफ तो जरूर होगा, भले ही वो जीवन भर शहरी ही क्यों न रहा हो। कभी गांव में भले न गया हो, लेकिन कहीं आते-जाते गांवों को जरूर ही देखा होगा। जहां हो रहे बदलावों को भी कइयों ने इस दौरान अवश्य ही महसूस किया होगा। मैं भी इनमें शामिल हूं। फर्क बस ये है कि मेरा बचपन गांव की मिट्टी में ही खेलकूद कर बीता था। बहरहाल, अब अधिकतर गांवों में भी आधुनिकता ने प्रवेश कर ही लिया है और तेजी से बदलाव ला रहा है। शहर से पीछे रहना मानों गांवों को अब अच्छा नहीं लग रहा।
करीब हर शख्स गांव शब्द से वाकिफ तो जरूर होगा, भले ही वो जीवन भर शहरी ही क्यों न रहा हो। कभी गांव में भले न गया हो, लेकिन कहीं आते-जाते गांवों को जरूर ही देखा होगा। जहां हो रहे बदलावों को भी कइयों ने इस दौरान अवश्य ही महसूस किया होगा। मैं भी इनमें शामिल हूं। फर्क बस ये है कि मेरा बचपन गांव की मिट्टी में ही खेलकूद कर बीता था। बहरहाल, अब अधिकतर गांवों में भी आधुनिकता ने प्रवेश कर ही लिया है और तेजी से बदलाव ला रहा है। शहर से पीछे रहना मानों गांवों को अब अच्छा नहीं लग रहा।
मिट्टी के घर कंक्रीट के मकानों में बदल रहे हैं। लोग आधुनिक होते जा रहे हैं। खेती होती है, लेकिन मशीनों से। बैलों की जोड़ी कभी कदार ही दिखती हैं। जहां युवाओं में पारंपरिक परिधान के बजाए फैशन हावी होता हुआ प्रतीत हो रहा है। धोती कुर्ता की जगह अब हम पैंट शर्ट वाले होते जा रहे हैं। बाग-बगीचों की जगह शॉपिंग काम्प्लेक्स भी बनते जा रहे हैं। अक्सर शहरों में मिलने वाली सुख सुविधाओं को अपने आसपास देखकर लोग खुश हो रहे हैं।
कबड्डी, गिल्ली डंडा अब यहां कम होते हैं। कंचे तो लगभग गायब ही हो चुके हैं। गांवों में पहले इन खेलों की खूब पहचान हुआ करती थी। कटौती के साथ ही सही अब बिजली भी गांवों तक पहुंचने ही लगी है। कटौती की भरपाई भी इन्वर्टर से होने लगी है। अब गांव में गांव जैसी बात ढूंढने पर भी कम ही मिलती हैं। गांवों का शहरीकरण होने लगा है। सोच भी अपने को शहरी बनाने में लगा हुआ है। खेत कम मकान ज्यादा होने लगे हैं। जहां रहने वाले तो कम पर भवन आलीशान बन रहे हैं।
फुर्सत में भी अब गांव बिजी जैसा लगता है। बातें भी सलाम दुआ तक ही सीमित होने लगी हैं। छोटी सी आबादी में भी अक्सर कुछ मनभेद पैदा हो रहे हैं। सुलझाने वालों से ज्यादा बरगलाने वाले नजर आते हैं। नौकरियां मिल नहीं रहीं, नौजवान क्रेता व विक्रेता होते जा रहे हैं। खेती, कामकाज छोड़कर कुछ बेरोजगार तो अब नेता होते जा रहे हैं। चूरा, गुड़, दाने तो बीते दिनों की बात हो गई है। कभी पुआलों पर खेलने वाले भी अब सयाने से नजर आते हैं। दुआरों पर भी लोग नहीं दिखते।
शायद सभी के अपने-अपने आशियाने हो गए हैं। ईद, बकरीद, दीवाली, होली सब बहाने हो गए हैं। मिलने जुलने वाले भी मानो पुराने हो गए हैं। हर हाथ में अब मोबाइल इठलाता है। ट्विटर, वाट्सएप, फेसबुक का बोलबाला है। नीम, बरगद, पीपल, बगीचों में अब नींद कहां आती है। हम तो कूलर एसी वाले हो गए हैं। गांव की मीठी बोली भूल रहे हैं। कम ही सही, पर अब हम टूटी फूटी अंग्रेजी वाले हैं। पुराना गांव अब कहां मिलने वाला है। शायद, मेरा गांव भी अब शहर हो चला है।
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