यूपी चुनाव में मतदान का अंतिम चरण संपन्न हो चुका है। आपाधापी भी अब कम हो चुका है। हां, परिणाम को लेकर तनाव थोड़ा बढ़ गया है। अबतक रैलियों की भागादौड़ी थी और अब रिजल्ट को लेकर व्याकुलता है। प्रतिवर्ष जो हाल दसवीं और बारहवीं के बच्चों का बोर्ड एग्जाम के बाद होता है। वही हाल हर पांच साल बाद नेताजी लोगों का भी हो जाता है। कहीं-कहीं, कभी कदार पांच बरस से पहले भी ऐसा हाल हो जाता है।
बच्चों की बोर्ड की परीक्षाएं तो अभी चल रहीं हैं। जबकि यूपी में नेताजी लोगों की चुनाव रूपी परीक्षा एक दिन पहले ही संपन्न हुई है। नेताजी लोगों की ओर से दी गई इस चुनावी परीक्षा का परिणाम शनिवार तक सबके सामने होगा। लेकिन रिजल्ट तो रिजल्ट ही होता है। पास फेल के अलावा आजकल तो परसेंटेज भी अच्छी रखनी पड़ती है। तब ही कोई बात या जश्न बनती है। कम नंबर पर तो बड़ा परिश्रम करना पड़ता है।
एक विषय में कम नंबर आए तब तो ग्रेस मार्क ही नैया पार लगा पाएगा। वो भी किस्मत से ही मिलता है। लेकिन जब मिलता है, तो अगली कक्षा में तो पहुंचा ही देता है। ये भी न मिले तो पूरक परीक्षा दीजिए या फिर से पिछली कक्षा में ही पढ़िए। फिलहाल, परीक्षा में जिनका पेपर अच्छा गया वो तो थोड़े कम टेंशन ले रहे होंगे, लेकिन ले जरूर रहे होंगे। सही है। हम सबने कभी न कभी परीक्षा तो दी ही है। स्वयं अनुभव कर लीजिए या अपने विद्यार्थी जीवन को ही याद कर लीजिए। होती थी न टेंशन।
एक बात और परीक्षा की तैयारी करने के दौरान या परीक्षा से पूर्व कई परीक्षार्थी ऐसे भी होते हैं, जो चिल्ला चिल्ला कर पढ़तें हैं। अक्सर पूरा मोहल्ला उनकी इस पढ़ाई का कायल हो उठता है। कुछ परीक्षार्थी थोड़ा बोल बोल कर या मन ही मन पढ़ने की रस्म अदा करतें हैं। कुछ पढ़ने वाले तो ऐसे भी होते हैं, जो पढ़ते हुए ज्यादा नहीं दिखते, पर परीक्षा की गम्भीरता को भलीभांति और बड़े अच्छे से समझते हैं। इसलिए वो भी अपनी तैयारी अपने ढंग से ही करते हैं।
कुछ ऐसे विशेष परीक्षार्थी भी मिलते हैं, जो पूरे सत्र में सीधे प्रश्नपत्र ही पढ़ते हैं और प्रश्नों के जवाब सीधे उत्तर पुस्तिकाओं में ही लिखते हैं। सबसे कम तनावग्रस्त यही होते होंगे। और कभी-कभी कुछ चमत्कार भी तो हो ही जाते हैं। आप तो समझते ही होंगे। यूपी के इस चुनाव में भी लगभग ऐसी ही स्थिति रही। कोई खूब छाया रहा तो, कोई कम ही नजर आया। किसी को खूब दिखाया गया तो, किसी को नजरंदाज भी किया गया। अब किसने कैसी परीक्षा दी, रिजल्ट में इसका पता चल ही जाएगा।
चुनावी परीक्षा में एक बात गौर करने वाली ये भी होती है कि मूल्यांकन करने वाले मतदातारूपी शिक्षक भी अंकों का सिर्फ अंदाजा या अनुमान ही लगा सकते हैं। जबकि मूल्यांकन की सभी प्रकार की जिम्मेदारी सिर्फ इन्ही पर ही रहती है। अब तो मूल्यांकन का कार्य भी पूरा हो चुका है। बस अंकों का जुड़ना शेष रह गया है। 11 मार्च को ये भी हो जाएगा। फिलहाल, कल तक जो हाथ मतदाताओं के सामने वोट के लिए जुड़ते थे, अब दुआओं और प्रार्थनाओं के लिए जुड़ रहे हैं।
हर दिन रिजल्ट को लेकर व्याकुलता बढ़ती जाएगी। इसका शोर तो नहीं सुनाई देगा, पर तनाव रैलियों से कहीं अधिक होगा। कार्यकर्ता थोड़े सुकून में होंगे, लेकिन उम्मीदवारों को रिजल्ट तक कम ही नींद आएगी। क्योंकि यहां तो फेल होने पर पिछली कक्षा में पढ़ने का मौका मिलेगा कि नहीं, इसका भी भरोसा थोड़ा कम ही होता है। कई ऐसे परीक्षार्थी आपके आस पास भी होंगे, जिन्हें मौका नहीं मिल पाया होगा। शनिवार तक सब क्लियर भी हो जाएगा। फिर कुछ दिन परिणाम को लेकर चर्चाएं चलेंगी।
विचार विमर्श होंगे। निश्कर्ष निकाले जाएंगे। हार जीत को लेकर मंथन भी होंगे। कहीं हार की जिम्मेदारी ली जाएगी, तो कहीं जीत का श्रेय भी दिया जाएगा। परीक्षा से पूर्व जिन दिग्गजों ने ट्यूशन पढ़ाया था, उनकी भी समीक्षा होगी। हो सकता है, कुछ नाराज अभिभावक दूसरा ट्यूशन पढ़ाने वाला ढूंढ लें या रख लें। इसी तरह कुछ ट्यूशन पढ़ाने वालों की ख्याति, मान, सम्मान भी बढ़ सकता है। सबकुछ परिणाम पर ही निर्भर करता है। धीरे धीरे चुनावी खुमार उतर जाएगा। चुनाव की बातें भी कम होने लगेंगी। थोड़े दिनों बाद बारी आएगी वादों को पूरा करने का। यह भी एक बहुत कठिन परीक्षा की तरह ही होता है। कुछ ही इसमें खरा उतर पाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे 10वीं या 12वीं के बाद टेक्निकल, मेडिकल, प्रोफेशनल या अन्य किसी कोर्स में प्रवेश के लिए इंट्रेंस एग्जाम। जिसमें कुछ होनहार ही कामयाब हो पाते हैं।
वादों पर कौन खरा उतरेगा इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। क्योंकि सारे वादे पूरे करने वाले अबतक तो न के बराबर ही हैं। यकीन न हो तो वादों का इतिहास देख लीजिए। सब हकीकत सामने आ जाएगा। कई वादे तो चुनावों के थोड़े ही समय बाद जुमले भी घोषित हो सकते हैं। किसी की भी गद्दी हो। बहुत अच्छे दिन आएंगे, इसकी कल्पना भर ही करना बेहतर होगा। क्योंकि अच्छे दिन अबतक तक कहीं भी आएं हैं क्या। यकीन न हो तो फिर से इतिहास के पन्नों को पलट कर देख लीजिए। सत्ता नई हाथों में आए, चाहे पुरानी हाथों में ही कायम रहे। मेरे अनुभव से तो बहुत थोड़े की ही आकांक्षा रखनी चाहिए। क्योंकि बहुत अच्छा भी होगा तब भी आम लोगों की स्थिति कुछ ऐसी ही रहेगी कि 'आसमान से गिरे, तो खजूर पर अटके'। मैं तो यही समझ और देख रहा हूं। शायद आप भी तो समझते ही होंगे। फिलहाल, शनिवार की प्रतीक्षा करिए।
बच्चों की बोर्ड की परीक्षाएं तो अभी चल रहीं हैं। जबकि यूपी में नेताजी लोगों की चुनाव रूपी परीक्षा एक दिन पहले ही संपन्न हुई है। नेताजी लोगों की ओर से दी गई इस चुनावी परीक्षा का परिणाम शनिवार तक सबके सामने होगा। लेकिन रिजल्ट तो रिजल्ट ही होता है। पास फेल के अलावा आजकल तो परसेंटेज भी अच्छी रखनी पड़ती है। तब ही कोई बात या जश्न बनती है। कम नंबर पर तो बड़ा परिश्रम करना पड़ता है।
एक विषय में कम नंबर आए तब तो ग्रेस मार्क ही नैया पार लगा पाएगा। वो भी किस्मत से ही मिलता है। लेकिन जब मिलता है, तो अगली कक्षा में तो पहुंचा ही देता है। ये भी न मिले तो पूरक परीक्षा दीजिए या फिर से पिछली कक्षा में ही पढ़िए। फिलहाल, परीक्षा में जिनका पेपर अच्छा गया वो तो थोड़े कम टेंशन ले रहे होंगे, लेकिन ले जरूर रहे होंगे। सही है। हम सबने कभी न कभी परीक्षा तो दी ही है। स्वयं अनुभव कर लीजिए या अपने विद्यार्थी जीवन को ही याद कर लीजिए। होती थी न टेंशन।
एक बात और परीक्षा की तैयारी करने के दौरान या परीक्षा से पूर्व कई परीक्षार्थी ऐसे भी होते हैं, जो चिल्ला चिल्ला कर पढ़तें हैं। अक्सर पूरा मोहल्ला उनकी इस पढ़ाई का कायल हो उठता है। कुछ परीक्षार्थी थोड़ा बोल बोल कर या मन ही मन पढ़ने की रस्म अदा करतें हैं। कुछ पढ़ने वाले तो ऐसे भी होते हैं, जो पढ़ते हुए ज्यादा नहीं दिखते, पर परीक्षा की गम्भीरता को भलीभांति और बड़े अच्छे से समझते हैं। इसलिए वो भी अपनी तैयारी अपने ढंग से ही करते हैं।
कुछ ऐसे विशेष परीक्षार्थी भी मिलते हैं, जो पूरे सत्र में सीधे प्रश्नपत्र ही पढ़ते हैं और प्रश्नों के जवाब सीधे उत्तर पुस्तिकाओं में ही लिखते हैं। सबसे कम तनावग्रस्त यही होते होंगे। और कभी-कभी कुछ चमत्कार भी तो हो ही जाते हैं। आप तो समझते ही होंगे। यूपी के इस चुनाव में भी लगभग ऐसी ही स्थिति रही। कोई खूब छाया रहा तो, कोई कम ही नजर आया। किसी को खूब दिखाया गया तो, किसी को नजरंदाज भी किया गया। अब किसने कैसी परीक्षा दी, रिजल्ट में इसका पता चल ही जाएगा।
चुनावी परीक्षा में एक बात गौर करने वाली ये भी होती है कि मूल्यांकन करने वाले मतदातारूपी शिक्षक भी अंकों का सिर्फ अंदाजा या अनुमान ही लगा सकते हैं। जबकि मूल्यांकन की सभी प्रकार की जिम्मेदारी सिर्फ इन्ही पर ही रहती है। अब तो मूल्यांकन का कार्य भी पूरा हो चुका है। बस अंकों का जुड़ना शेष रह गया है। 11 मार्च को ये भी हो जाएगा। फिलहाल, कल तक जो हाथ मतदाताओं के सामने वोट के लिए जुड़ते थे, अब दुआओं और प्रार्थनाओं के लिए जुड़ रहे हैं।
हर दिन रिजल्ट को लेकर व्याकुलता बढ़ती जाएगी। इसका शोर तो नहीं सुनाई देगा, पर तनाव रैलियों से कहीं अधिक होगा। कार्यकर्ता थोड़े सुकून में होंगे, लेकिन उम्मीदवारों को रिजल्ट तक कम ही नींद आएगी। क्योंकि यहां तो फेल होने पर पिछली कक्षा में पढ़ने का मौका मिलेगा कि नहीं, इसका भी भरोसा थोड़ा कम ही होता है। कई ऐसे परीक्षार्थी आपके आस पास भी होंगे, जिन्हें मौका नहीं मिल पाया होगा। शनिवार तक सब क्लियर भी हो जाएगा। फिर कुछ दिन परिणाम को लेकर चर्चाएं चलेंगी।
विचार विमर्श होंगे। निश्कर्ष निकाले जाएंगे। हार जीत को लेकर मंथन भी होंगे। कहीं हार की जिम्मेदारी ली जाएगी, तो कहीं जीत का श्रेय भी दिया जाएगा। परीक्षा से पूर्व जिन दिग्गजों ने ट्यूशन पढ़ाया था, उनकी भी समीक्षा होगी। हो सकता है, कुछ नाराज अभिभावक दूसरा ट्यूशन पढ़ाने वाला ढूंढ लें या रख लें। इसी तरह कुछ ट्यूशन पढ़ाने वालों की ख्याति, मान, सम्मान भी बढ़ सकता है। सबकुछ परिणाम पर ही निर्भर करता है। धीरे धीरे चुनावी खुमार उतर जाएगा। चुनाव की बातें भी कम होने लगेंगी। थोड़े दिनों बाद बारी आएगी वादों को पूरा करने का। यह भी एक बहुत कठिन परीक्षा की तरह ही होता है। कुछ ही इसमें खरा उतर पाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे 10वीं या 12वीं के बाद टेक्निकल, मेडिकल, प्रोफेशनल या अन्य किसी कोर्स में प्रवेश के लिए इंट्रेंस एग्जाम। जिसमें कुछ होनहार ही कामयाब हो पाते हैं।
वादों पर कौन खरा उतरेगा इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। क्योंकि सारे वादे पूरे करने वाले अबतक तो न के बराबर ही हैं। यकीन न हो तो वादों का इतिहास देख लीजिए। सब हकीकत सामने आ जाएगा। कई वादे तो चुनावों के थोड़े ही समय बाद जुमले भी घोषित हो सकते हैं। किसी की भी गद्दी हो। बहुत अच्छे दिन आएंगे, इसकी कल्पना भर ही करना बेहतर होगा। क्योंकि अच्छे दिन अबतक तक कहीं भी आएं हैं क्या। यकीन न हो तो फिर से इतिहास के पन्नों को पलट कर देख लीजिए। सत्ता नई हाथों में आए, चाहे पुरानी हाथों में ही कायम रहे। मेरे अनुभव से तो बहुत थोड़े की ही आकांक्षा रखनी चाहिए। क्योंकि बहुत अच्छा भी होगा तब भी आम लोगों की स्थिति कुछ ऐसी ही रहेगी कि 'आसमान से गिरे, तो खजूर पर अटके'। मैं तो यही समझ और देख रहा हूं। शायद आप भी तो समझते ही होंगे। फिलहाल, शनिवार की प्रतीक्षा करिए।

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