कभी कभार दिख जाते हैं ऐसे नजारे

कभी कभार ऐसे दृश्य दिख जाते हैं, जो सोचने को मजबूर कर देते हैं। हाल ही में ऐसे कई दृश्य नजरों के सामने आए। आर्थिक समानता-असमानता, निर्धनता, संपन्नता, विकास, हर्ष व दुरूख सब ही इन दृश्यों में शामिल रहे। सभी अपने आप में ही व्यस्त रहे। पर कुछ दृश्य रोचक होने के साथ साथ कई बातें कह रहीं थी, शायद सुनने या समझने वाला कोई था नहीं।

दृश्य-1 
ऐसा ही नजारा एक बस्ती में दिखा। जहां पक्के मकान, गार्डन या कोई भी आधुनिक सुख सुविधा नहीं थी। हांं, बबूल की कुछ झाडिय़ां जरूर थी। इन्हीं में कुछ घर, जो पन्नियों एवं लकड़ी वगैरह से बने थे। इनपर डीटीएच नजर आया। विकास ने यहां के लोगों की भले ही दशकों से सुध न ली हो। लेकिन टीवी ने दस्तक दे दी है। चलो, कम से कम यहां के लोग देश दुनिया की बातों से वाकिफ तो रह सकेंगे। सुन तो सकेंगे कि कितने वर्षों से बदलाव व तरक्की की बातें हो रही हैं। 

इतना ज्ञान तो टीवी प्रदान कर ही सकता है। वैसे भी आजकल खूब जमकर विकास व तरक्की की बातें हो रही हैं। बातें हकीकत बनी तो डीटीएच कच्ची झोपडिय़ों की जगह पक्के मकानों में नजर आएंगी। पर अक्सर ऐसा हर जगह हो नहीं पाता। फिर भी निर्धन वर्ग में आस तो बन ही जाती है। जहां पहुंचने के लिए रोड नहीं हैं, वहां तक डीटीएच पहुंच गया है और सबको सभी के वादे बताने लगा है। लोग भी अब पहले से जागरूक होने ही लगे हैं। लोग सच्चे झूठे वादे भी याद रखेंगे।

दृश्य-2
हाल ही में एक छोटे से नगर में बड़ा आयोजन हुआ। इसमें हजारों लोग शामिल हुए। छोटे से नगर में ऐसे कार्यक्रम कम ही होते हैं। सभी में उत्सुक्ता बरकरार थी। नगर को भी सजा दिया गया। हमेशा धूल व गंदगी से भरी रहने वाली सड़कें भी जगमगा रही थीं। नालियां भी सुंदर सी प्रतीत हो रही थीं। ट्रैफिक व्यवस्था भी काफी दुरुस्त नजर आ रही थी। गीत संगीत भी रह-रह कर सुनाई पड़ रहे थे। आखिर कार्यक्रम का दिन भी आ गया। सुबह से ही नगर में गतिविधियां सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा ही दिखाई पड़ रही थीं। कार्यक्रम था विवाह सम्मेलन का। इसका आयोजन सरकारी स्तर पर हो रहा था। एक साथ एक हजार से ज्यादा जोड़े विवाह बंधन में बंधने जा रहे थे। खुशी का माहौल था। इसमें जनप्रतिनिधि भी शामिल हो रहे थे।

बहरहाल यहां जो दृश्य नजर आए वह बहुत कुछ बयां कर रहे थे। इसी में एक नजारा था हेलीकॉप्टर का, जो आकाश में उड़ता हुआ यहां उतरा। दूसरा दृश्य था स्वागत करने वालों का, जो स्वागत के लिए कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहते थे। हेलीकॉप्टर से उतरते ही नेताजी का खूब स्वागत सत्कार किया गया। कार्यक्रम में जोड़े घंटों बैठकर विवाह की रस्में अदा कर रहे थे। नेताजी के पहुंचते ही पुष्पों की वर्षा हो जाती है। और सम्मेलन में मौजूद जोड़े पीढ़े पर बैठे रस्में निभाते रहे। खयाल आया कि शादी में बराती कहां हैं। नजरों ने ढूंढा तो दिखा कि बांस और बल्लियों से बनाए गए बैरीकेट्स पर हाथ रखकर सैकड़ों लोग खड़े हैं, जिन्हे बैरीकेट्स पर ज्यादा जोर नहीं देने के लिए बार-बार चेताया भी जा रहा था।


पहली बार बराती इतनी दूर से ही विवाह में शामिल हो रहे थे। अजीब नजारा था। बराती और दूल्हा दूल्हन की जगह यहां किसी और पर ही फूलों की बारिश हो रही थी। अगवानी भी दूसरे की ही बड़े जोर शोर से की जा रही थी। अबतक मैने यही देखा था कि विवाह समारोहों में बराती व दूल्हे का खूब सत्कार किया जाता है। उनका हर प्रकार से खयाल रखा जाता है। घराती भी एक पांव पर सेवा के लिए खड़े रहते हैं। पर यहां, ऐसा कुछ नहीं था। सभी हेलीकॉप्टर वालों के लिए एक पांव पर खड़े दिखाई पड़े। अक्सर शादियों में सेहरों से ढके दूल्हों की झलक देखने को सभी बेकरार दिखाई पड़तें हैं।

यहां दूल्हें को छोड़कर किसी और की झलक पाने की बेसब्री थी। एक साथ सैकड़ों जोड़ों का विवाह कराकर कम खर्च में शादी समारोह को बढ़ावा दिया जाना था। सामूहिक विवाह सम्मेलनों में ऐसा होता भी है। कम खर्च में ही बेहतर व्यवस्था हो जाती है। इसका प्रचलन भी अब धीरे-धीरे कई स्थानों पर बढ़ रहा है। लेकिन इस सम्मेलन में बात-बात में ही खर्च इतना हो गया कि हजारों की शादी खुशी खुशी निपट जाती। बहरहाल, यहां भी शादी का आयोजन सफल रहा। हेलीकॉप्टर वाले भी एक से डेढ़ घंटे रुककर रवाना हो गए। फूल बरसाने वाले भी अब थोड़ा आराम के मूड में दिखे। जोश से भरे छुटभैय्ये, जो दौड़ दौड़ कर पलकें बिछाने का कार्य कर रहे थे, अब हंस-हसं कर बातें करते दिखे।

चापलूसी वाली मुस्कान इनके चेहरों से गायब थी और अब रौब वाली हंसी दिख रही थी। बड़े साहब के जाते ही ये बड़े साहब बनने लगे। इसी का एक दृश्य यह भी था कि बड़े साहब के जाते ही कुर्सियां धड़ाधड़ खाली हो गईं। मिनटों में ही कुर्सियों एक दूसरे पर रखकर तह भी लगा दिए गए। कुछ देर पहले तक जहां पांव रखने की भी जगह नहीं मिल रही थी। वहां खुला मैदान नजर आने लगा। अच्छा ही था ये कुर्सियां सामान्य हम जैसे लोगों के बैठने के लिए थी। वरना आजकल तो कुछ कुर्सियों के पीछे महारथियों की भारी भीड़ पड़ी हुई है। जिनके दम पर ये कुर्सियां प्राप्त की जा सकती हैं, वो भी कुछ दिनों से अपने आपको को महारथी से कम नहीं समझ रहे हैं। सही भी है।

असली महारथी तो आम लोग ही है। बस समझने की देर होती है। पंडाल में बैठे जोड़े जो सामने हुआ देखते ही रहे। जो उनके सामने नहीं हो रहा था, उसके बारे में शायद कल्पना तो कर ही रहे होंगेे। कितनी खातिरदारी हुई समझते ही होंगे। हां इस दौरान मिले भेंट से उनके चेहरों पर थोड़ी खुशी जरूर दिखाई पड़ी। जाते-जाते पौधे भी उपहार स्वरूप दिए गए। अपनी शादी की याद में इनका रोपण करने का आह्वान किया गया। बेशक बहुत बढिय़ा उपहार एवं कदम था। पेड़ लगाने का। पेड़ों की सुरक्षा करने को भी कहा गया। ताकि वे फल फूल सकें। जोड़ों ने भी बड़े हर्ष से इस तौहफे को स्वीकार किया।

पेड़ उन्हें शादी की हर बात से ताजा करता रहेगा और पर्यावरण को भी बेहतर बनाएगा। रस्में चलती रहीं, इसी दौरान पंडाल से बाहर भी कुछ नजारे थे। एक वृद्ध चाय का ठेला लगाए थे। केतली और स्टोव भी साथ में ही था। लेकिन चाय की केतली भी ऐसी लग रही थी जैसे, घंटों से इसमें चाय नहीं बनाई गई हो। स्टोव भी अपना योगदान देने के लिए बेसब्र ही नजर आ रहा था। लेकिन हजारों की भीड़ में भी कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था। आसपास मौजूद एम्बुलेंस, दमकल, ज्यूस की दुकानों से घूमफिर कर वृद्ध की नजरें फिर से ग्राहक ढूंढने लगते। पर ग्राहक नहीं ही मिले।

करोड़ों खर्च कर हो रहे सम्मेलन में पांच रु. का चाय पीने वाला कोई नहीं मिला। इसी तरह पंडाल से थोड़ी दूरी पर एक जनाब खिलौने बेचते भी नजर आए। घूम-घूम कर खिलौने बेचने का प्रयास करते रहे। लोग भी कीमत पूछकर आगे बढ़ जाते। लोग भी खिलौने या चाय की जगह सड़कों पर कदम-कदम पर लगाए गए बैनर, होर्डिंग्स, पोस्टर में फोटो ही देख रहे थे। कई तो इन्हें लटकाकर अपने साथ भी चलते बने। प्रेम में नहीं, बस घर में कहीं किसी टूटी दीवार की जगह इन्हें लगाने के लिए या पुरानी पन्नियों की जगह छत का उपयोग करने के लिए। कुछ लोग सजाने के लिए भी ले गए। फोटो से ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों को अपनी जरूरतें लगीं। आखिर फोकट में यहां आने का कुछ तो लाभ मिले। वैसे भी छोटे नगरों में ऐसे मौके कहां मिलते हैं।

सुबह से दोपहर हो गया और कार्यक्रम भी अंतिम चरणों में पहुंच गया। सबकुछ सफल ही रहा। पर ये दृश्य याद रहा शादी किसी और की थी और फूलों की बारिश किसी और पर ही होती रही। बराती कोई और ही था और स्वागत किसी और का ही हो रहा था। हेलीकॉप्टर व इसका सवार भी दिखा और ग्राहक के इंतजार में बूढ़ी आंखे भी। दूल्हे राजा के होते हुए भी राजा कोई और लगा।

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