सोचें, भविष्य में पानी की कीमत क्या होगी

S.Khan February 15, 2017 
पानी अनमोल है। इसकी कीमत नहीं चुकाई जा सकती। ना ही इसे बनाया जा सकता है। पानी की परेशानी अब हर तरफ बढ़ रही है। लेकिन इसकी बर्बादी पर अब भी हम सतर्क नहीं हैं। पानी को व्यर्थ करने के बाद भी हमें तनिक अफसोस नहीं होता। ऐसा ही रहा तो भविष्य में हम पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेंगे। जागरुकता की दरकार अभी बुहत ज्यादा है। पानी से भरपूर स्थानों पर रहने वाले शायद पानी की कीमत कम ही समझते होंगे। जबकि कई स्थान ऐसे हैं, जहां गर्मी के दिनों में पानी के लिए मारामारी होती है। मीलों दूर तक भटकना पड़ता है। सूखी नदियों व कुंओ को खोदकर पानी की एक-एक बूंद जमा की जाती है। इसपर भी साफ पानी का मिलना मुश्किल ही रहता है। तालाबों को हम पुराने जमाने की व्यवस्था समझकर इसको बढ़ावा कम ही दे रहे हैं। पर धीरे-धीरे तालाबों की अहमियत अब सामने आने लगी है।




हजारों के लिए तालाबों से ही पानी मयस्सर हो पाता है। पहले जहां तालाब हर गांव में दर्जनों की संख्या में होते थे, अब नहीं दिखते। तालाब सूखते जा रहे हैं। कई बड़े तालाब हर गर्मी में पानी विहीन होने लगे हैं। बारिश के दौरान सारा पानी व्यर्थ बहा दिया जाता है। जबकि इसे सहेजा जा सकता है। पानी की हर बूंद हमारे लिए बेशकीमती है। पिछले वर्ष भी पानी के लिए कई स्थानों पर संकट पैदा हो गया था। आननफानन पानी का इंतजाम कराना पड़ा था। कुंए अब इतिहास बनने लगे हैं। कुंओं को अब पाट दिया जा रहा है। कम ही लोग अब कुएं का उपयोग करते हैं। लेकिन इसकी महत्ता आज भी है। हर गांव, शहर में दर्जनों ऐसे कुंए होंगे, जिनमें पानी मौजूद हैं, लेकिन उनका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

कुंए में कूड़ा, कचरा फेंका जा रहा है। इससे उसका पानी भी दूषित हो रहा है। कुंए को साफ सुथरा कर, सफाई कर पानी का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन हम खरीद कर पानी पीने की आदत डालते जा रहे हैं। ऐसे में कुंए बेसहारा होते जा रहे हैं। पुराने जमाने में कुंए को अहम स्थान हासिल था। बहुत से कुंए तो शानदार महलों की तरह प्रतीत होते थे। जिनमें कारीगरी भी कमाल की होती थी। कुंए में पानी की सतह तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां तक बनी होती थी। बावड़ी भी इसी की एक कड़ी है। आज बावडिय़ों की हालत क्या है किसी से छिपा नहीं है। बावडिय़ां अतिक्रमण व गंदगी का शिकार बन चुकी हैं। इनका पानी उपयोग में नहीं लाया जाता, जबकि भीषण गर्मी में भी अधिकतर बावडिय़ों में भरपूर पानी होता है।

पानी की उपलब्धता वाले जगहों पर प्राकृतिक जल स्त्रोतों को भूला दिया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि भरपूर पानी होने के बाद भी इन स्थानों पर कई दफा पानी की किल्लत उभर आती है। बावडिय़ों को साफ कर इसके पानी का उपयोग किया जा सकता है। पानी की अहमियत समझनी हो तो राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैस राज्यों में इसके उदाहरण मिल जाएंगे। जहां गर्मी के दिनों में पानी के लिए प्रतिदिन लोग सुबह से ही निकल जाते हैं, लौटकर आते आते दिन चढ़ आता है। एक बाल्टी पानी के लिए मीलों तय करना पड़ता है। अधिकतर छोटी नदियां एवं तालाब सूख जाते हैं। सूखी नदियों में गड्ढा कर झीरे बनाए जाते हैं। इससे पानी रिसकर एक जगह जमा होता है। घंटों इंतजार के बाद एक से दो फीट पानी एक से डेढ़ मीटर के दायरे में जमा हो पाता है।

इसी से लोगों को अपनी प्यास बुझानी पड़ती है। पानी सहेजने को लेकर हम जल्द ही नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं जब हम पानी के लिए भटकने को विवश होंगे। पानी के सहेजने के लिए कई तरीके अपनाए जा सकते हैं। जरूरत भर पानी का ही उपयोग करें। व्यर्थ पानी नहीं बहने दें। नलों में टोटियां लगाएं। दूसरों को भी पानी बचाने के लिए प्रेरित करें। कुंओं एवं तालाबों का संरक्षण करें। घरों में वॉटर हार्वेस्टिंग का उपाए करें। बारिश के पानी को सहेजकर रखें। पानी का महत्व अब भी नहीं समझ पाएं, तो पानी के लिए बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। अब बड़े शहरों से होकर छोटे गांवों तक पानी का बाजारीकरण होता जा रहा है। पानी केन व बोतलों में बिकने लगा है।

अब तक गांवों में लोग इससे दूर थे, लेकिन गांवों में भी इसकी जरूरत पडऩे लगी है। अभी हम पानी के प्रति बोतल या केन के लिए दस से बीस रु. तक चुका रहे हैं। पानी की यह कीमत बहुत कम है। पानी की उपलब्धता धीरे-धीरे कम हो रही है। जबकि इसकी जरूरत तेजी से बढ़ती जा रही है। पानी नहीं बचाएंगे तो एक दिन पानी के एक बोतल के लिए कितनी कीमत चुकानी होगी। इसका अंदाजा कर ही सकते हैं। क्योंकि किसी लैब इसे तैयार करना मुश्किल है। आने वाली पीढिय़ों के लिए पानी को बचाना होगा। जल स्त्रोतों को बचाना होगा। नदियों को फिर से जीवन प्रदान करना होगा। ऐसा तभी होगा, जब हम पानी को लेकर गंभीर होंगे। हम सभी को मिलकर पानी सहेजना होगा।

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