S.Khan February 27, 2017
यूपी में चुनाव अंतिम पड़ाव में पहुंच चुका है। इस दफा चुनाव का मंजर थोड़ा बदला हुआ नजर आया। जो आखिरी पड़ाव के करीब आकर कुछ विचलित हो गया। फिरभी इस बार चुनाव कई मायनों में अलग ही नजर आया। सभाओं में जाति और सांप्रदायिक अपीलें कम ही देखने सुनने को मिलीं। अब पहले से ज्यादा लोग शिक्षित हैं। तर्क करने की काबिलियत भी बढ़ रही है। ऐसे में भेदभाव वाली अपीलों की ताकत अब तेजी से खत्म होती दिख रही है।
इनके बजाए अब जनता काम, विकास, रोजगार, सुविधा पर ज्यादा ध्यान दे रही है। होना भी यही चाहिए। विकास, लोगों की सुविधाएं और बेरोजगारी जैसे प्रश्न ही बड़े हैं, न कि जाति एवं सांप्रदायिकता के। यूपी में इस बार जागरूक जनता जनप्रतिनिधियों से काम की बातें ही पूछ रहीं हैं। पुराने ढर्रे पर लोगों को अपने पक्ष में करने की राजनीति को अब जनता अस्वीकार कर रही है। इस बदलते नजरिए को देखते हुए ही शायद चुनाव लड़ रहे नेता अब विकास की बातों को ही ज्यादा तारजीह दे रहे हैं।
कितना विकास हुआ है, कितना काम हुआ है, कितनी बेरोजगारी घटी है आदि बातों का जनता खूब मूल्यांकन करने लगी है। इस आधार पर ही अपना कीमती मत भी दे रही है। चुनाव चल ही रहे हैं। नतीजा किसी के भी पक्ष में आए। जीत जनता की ही होगी। ये सुनिश्चत है। अभी कुछ स्थानों पर चुनाव होने शेष हैं। इसके पूर्व हुईं कुछ सभाओं में कई हास्यास्पद बयान भी सुनने को मिले ही हैं। लेकिन बस ये बयान हैं और बयानों का क्या। चुनाव के अंतिम पड़ाव में रैलियों में काम की बातें थोड़ी देर के लिए हट गईं थी।
इनके बजाए अब जनता काम, विकास, रोजगार, सुविधा पर ज्यादा ध्यान दे रही है। होना भी यही चाहिए। विकास, लोगों की सुविधाएं और बेरोजगारी जैसे प्रश्न ही बड़े हैं, न कि जाति एवं सांप्रदायिकता के। यूपी में इस बार जागरूक जनता जनप्रतिनिधियों से काम की बातें ही पूछ रहीं हैं। पुराने ढर्रे पर लोगों को अपने पक्ष में करने की राजनीति को अब जनता अस्वीकार कर रही है। इस बदलते नजरिए को देखते हुए ही शायद चुनाव लड़ रहे नेता अब विकास की बातों को ही ज्यादा तारजीह दे रहे हैं।
कितना विकास हुआ है, कितना काम हुआ है, कितनी बेरोजगारी घटी है आदि बातों का जनता खूब मूल्यांकन करने लगी है। इस आधार पर ही अपना कीमती मत भी दे रही है। चुनाव चल ही रहे हैं। नतीजा किसी के भी पक्ष में आए। जीत जनता की ही होगी। ये सुनिश्चत है। अभी कुछ स्थानों पर चुनाव होने शेष हैं। इसके पूर्व हुईं कुछ सभाओं में कई हास्यास्पद बयान भी सुनने को मिले ही हैं। लेकिन बस ये बयान हैं और बयानों का क्या। चुनाव के अंतिम पड़ाव में रैलियों में काम की बातें थोड़ी देर के लिए हट गईं थी।
पिछले दिनों खबरों में विवादास्पद बयान और घोलमोल बयान ही खूब छाए रहे। बहरहाल, वोटर्स अब बदल गए हैं। जो काम की बातों को याद रखना ज्यादा पसंद करता है। इस चुनाव में कई मुद्दे पीछे छूट गए हैं, जो पिछले कई वर्षों से यहां पर पैर जमाकर बने हुए थे। इनकी जगह विकास के मुद्दे ने ले ली है। ठीक ही है, देर आए लेकिन दरुस्त आए। यूपी राजनीतिक दृष्टि से काफी समृद्ध है। बावजूद इसके यूपी को आज भी गरीब राज्यों में शुमार किया जाता है। प्रति व्यक्ति आय भी कम ही है।
इसलिए विकास की बात ही सर्वोपरि होनी चाहिए। ना कि फूट डालकर वोट बटोरने की। यहां बेराजेगारों की लंबी कतार है, जिन्हें रोजगार के बेहतर और समय पर अवसर भी प्रदान करने होंगे। शिक्षा का स्तर जिस तेजी से बढ़ रहा है, उस तेजी से रोजगार का सृजन यहां कम ही हो रहा है। युवाओं की पहली प्राथमिकता तो रोजगार ही रहता है। लेकिन कम ही दफा सभाओं में इसपर जिक्र किया जाता है। युवाओं का कल बेहतर हो, इसपर भी ध्यान होना चाहिए।
लेकिन इस संबंध में कोई जोर देकर वादा तो नहीं ही किया गया। ऐसा न हो कि, पहले की तरह युवा रोजगार के इंतजार में बैठा ही रह जाए और फिर से अगला चुनाव आ जाए। विवादास्पद बयानों की बजाए इस बार काम की बातों को लेकर कदम बढ़ रहे हैं तो इसका जारी रहना ही अच्छा है। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाएं हर किसी के पहुंच में हों। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी इसकी कमी खलती है। खासकर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की। यूपी की आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसकी तुलना में कॉलेज एवं अस्पतालों की संख्या कम ही बढ़ सके हैं।
देहाती क्षेत्रों में इस तरह की समस्याएं ज्यादा हैं। अभी भी महाविद्यालयों में पढ़ाई करने के लिए कुछ इलाकों में विद्यार्थियों को बीस-बीस किमी दूर तक जाना पड़ता है। इसी कमी की भरपाई ओपन विवि. से की जा रही है। इससे उच्च शिक्षा हासिल करने के इच्छुक ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को मदद भी मिल रही है। ठीक है, लेकिन कॉलेजों की स्थापना भी जरूरी है। जहां रेगुलर विद्यार्थी कक्षाएं अटेंड कर और बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें। क्योंकि आज भी बड़ी आबादी गांवों में ही रहती है।
जहां के युवाओं को शिक्षा के क्षेत्र में शहरों की तुलना में कम ही सुविधाएं मिल पाती हैं। हर कोई शहरों में जाकर पढ़ाई करने में सक्षम भी नहीं होता। गांव में रहकर ही बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसके लिए सुविधाएं बढऩी चाहिए। गांवों के आसपास ही रोजगार के सृजन के लिए भी प्रयास होने चाहिए, ताकि शिक्षा हासिल कर अपने घर गांव के करीब ही रोजगार मिल सके। इससे वह क्षेत्र भी विकिसत होगा। रोजगार के लिए पलायन की विवशता मिट जाएगी।
अस्पतालों की दशा भी ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत बेहतर नहीं होती। गांव-गांव स्वास्थ्य सुविधाएं तो मिल रही हैं। लेकिन अक्सर गांवों में बने छोटे मोटे स्वास्थ्य केंद्रों पर कोई स्वास्थ्य कर्मचारी नहीं दिखता। बीमार होने पर निजी चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है। लेकिन गंभीर बीमारी होने पर बड़े शहरों की ओर दौड़ लगानी पड़ती है। बड़े शहरों तक पहुंचने में समय काफी लगता है। खामियाजा मरीजों एवं तीमारदारों को भुगतना पड़ता है। कई मरीज अस्पताल तक का सफर भी पूरा नहीं कर पाते। ग्रामीण अंचलों में बेहतर अस्पतालों पर भी जोर होना चाहिए।
इसलिए विकास की बात ही सर्वोपरि होनी चाहिए। ना कि फूट डालकर वोट बटोरने की। यहां बेराजेगारों की लंबी कतार है, जिन्हें रोजगार के बेहतर और समय पर अवसर भी प्रदान करने होंगे। शिक्षा का स्तर जिस तेजी से बढ़ रहा है, उस तेजी से रोजगार का सृजन यहां कम ही हो रहा है। युवाओं की पहली प्राथमिकता तो रोजगार ही रहता है। लेकिन कम ही दफा सभाओं में इसपर जिक्र किया जाता है। युवाओं का कल बेहतर हो, इसपर भी ध्यान होना चाहिए।
लेकिन इस संबंध में कोई जोर देकर वादा तो नहीं ही किया गया। ऐसा न हो कि, पहले की तरह युवा रोजगार के इंतजार में बैठा ही रह जाए और फिर से अगला चुनाव आ जाए। विवादास्पद बयानों की बजाए इस बार काम की बातों को लेकर कदम बढ़ रहे हैं तो इसका जारी रहना ही अच्छा है। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बुनियादी सुविधाएं हर किसी के पहुंच में हों। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी इसकी कमी खलती है। खासकर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की। यूपी की आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसकी तुलना में कॉलेज एवं अस्पतालों की संख्या कम ही बढ़ सके हैं।
देहाती क्षेत्रों में इस तरह की समस्याएं ज्यादा हैं। अभी भी महाविद्यालयों में पढ़ाई करने के लिए कुछ इलाकों में विद्यार्थियों को बीस-बीस किमी दूर तक जाना पड़ता है। इसी कमी की भरपाई ओपन विवि. से की जा रही है। इससे उच्च शिक्षा हासिल करने के इच्छुक ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को मदद भी मिल रही है। ठीक है, लेकिन कॉलेजों की स्थापना भी जरूरी है। जहां रेगुलर विद्यार्थी कक्षाएं अटेंड कर और बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें। क्योंकि आज भी बड़ी आबादी गांवों में ही रहती है।
जहां के युवाओं को शिक्षा के क्षेत्र में शहरों की तुलना में कम ही सुविधाएं मिल पाती हैं। हर कोई शहरों में जाकर पढ़ाई करने में सक्षम भी नहीं होता। गांव में रहकर ही बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसके लिए सुविधाएं बढऩी चाहिए। गांवों के आसपास ही रोजगार के सृजन के लिए भी प्रयास होने चाहिए, ताकि शिक्षा हासिल कर अपने घर गांव के करीब ही रोजगार मिल सके। इससे वह क्षेत्र भी विकिसत होगा। रोजगार के लिए पलायन की विवशता मिट जाएगी।
अस्पतालों की दशा भी ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत बेहतर नहीं होती। गांव-गांव स्वास्थ्य सुविधाएं तो मिल रही हैं। लेकिन अक्सर गांवों में बने छोटे मोटे स्वास्थ्य केंद्रों पर कोई स्वास्थ्य कर्मचारी नहीं दिखता। बीमार होने पर निजी चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है। लेकिन गंभीर बीमारी होने पर बड़े शहरों की ओर दौड़ लगानी पड़ती है। बड़े शहरों तक पहुंचने में समय काफी लगता है। खामियाजा मरीजों एवं तीमारदारों को भुगतना पड़ता है। कई मरीज अस्पताल तक का सफर भी पूरा नहीं कर पाते। ग्रामीण अंचलों में बेहतर अस्पतालों पर भी जोर होना चाहिए।
वादे तो होते ही रहते हैं। वादे पूरे भी होने चाहिए। क्योंकि सोच तो बदल ही रहा है। शराब कई परिवारों को हर रोज बिखेर रहा है। ये बात जगजाहिर है। फिर इसपर भी बात होनी ही चाहिए थी। मेरी समझ में तो मुनाफे के बजाए शराब से नुकसान ज्यादा ही है। सरकारी खजाना इससे भले ही फल फूल रहा हो, लेकिन शराब की वजह से सड़क हादसे, बीमारी, परिवारों का टूटना, मारपीट आदि की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं।
कुछ राज्यों ने शराबबंदी कर मिसाल भी पेश की है। इससे भी सबक तो लेना ही चाहिए। कई ऐसी बातें हैं, जो सभाओं में कम ही सुनने को मिलती हैं। लेकिन इस बार के चुनाव में जनता ने इन बातों पर ही ज्यादा ध्यान देने का निर्णय लिया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है। तभी तो सांप्रदायिकता व जाति के अलाप थोड़े कम होने लगे हैं। नेताजी लोग भी इससे थोड़ा बचते ही नजर आ रहे हैं।
लेकिन कुछ दूसरे शब्दों में अर्थ बयां कर ही दे रहे हैं। लेकिन इसका असर और यादें ज्यादा देर तक नहीं रहने वाली। यूपी का चुनाव इस बार नए आदर्श कायम कर सकता है। अबतक तो चुनाव काम की बातों पर ही पूरा हुआ लगता है। यूपी विस. चुनाव एक नए परिर्वतन की ओर इशारा कर रहा है। जाति, धर्म व समुदाय आधारित वोट अपने पाले में करने की सियासी दलों की आदत को अब लोग नकार रहे हैं। ये चुनाव नई दिशा दिखा सकती है। बशर्ते पार्टियां इस आदत से दूर रहें। ताकि एक नई सुबह दिखे।
कुछ राज्यों ने शराबबंदी कर मिसाल भी पेश की है। इससे भी सबक तो लेना ही चाहिए। कई ऐसी बातें हैं, जो सभाओं में कम ही सुनने को मिलती हैं। लेकिन इस बार के चुनाव में जनता ने इन बातों पर ही ज्यादा ध्यान देने का निर्णय लिया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है। तभी तो सांप्रदायिकता व जाति के अलाप थोड़े कम होने लगे हैं। नेताजी लोग भी इससे थोड़ा बचते ही नजर आ रहे हैं।
लेकिन कुछ दूसरे शब्दों में अर्थ बयां कर ही दे रहे हैं। लेकिन इसका असर और यादें ज्यादा देर तक नहीं रहने वाली। यूपी का चुनाव इस बार नए आदर्श कायम कर सकता है। अबतक तो चुनाव काम की बातों पर ही पूरा हुआ लगता है। यूपी विस. चुनाव एक नए परिर्वतन की ओर इशारा कर रहा है। जाति, धर्म व समुदाय आधारित वोट अपने पाले में करने की सियासी दलों की आदत को अब लोग नकार रहे हैं। ये चुनाव नई दिशा दिखा सकती है। बशर्ते पार्टियां इस आदत से दूर रहें। ताकि एक नई सुबह दिखे।

0 Comments