भइया आप तो गधा मत ही बनिएगा



S.Khan February 24, 2017 
हर पांच वर्ष में चुनाव आते हैं। कभी कभी इस दरम्यान कई अन्य छोटे बड़े चुनाव भी होते रहते हैं। चुनाव के दौरान किसी पर्व से कम माहौल नहीं रहता। हर तरफ चहल पहल खूब ही रहती है। शहर से लेकर गांव तक रौनक नजर आता है। यही समय होता है जब नेताजी बेहद व्यस्त और मतदाता मस्त रहता है। बाकी के दिनों में अक्सर उल्टा ही रहता है। वर्तमान में कई जगहों पर वोट चल रहे हैं। कुछ स्थानों पर हो भी चुके हैं। जीत हार को लेकर उम्मीदवार जोड़ भाग में दिन बिता रहे हैं। समर्थक भी इसी तरह रिजल्ट को लेकर जिज्ञासु बने हुए हैं।

वोटर भी प्रत्याशियों के विजय पराजय को लेकर खूब चर्चा कर रहे हैं। नगर हो या गांव कई कई जगह लोगों का मजमा दिखता है। मजमे में चुनाव पर बड़े मजे से चर्चा होती रहती है। अक्सर चर्चाएं रोचक भी होती हैं। जो लोगों को घन्टों तक बांधे रखने में कामयाब भी साबित होती हैं। कई दफा तो चर्चा देर रात तक जारी रहती है। इसमें कई नतीजे भी निकाले जाते हैं। जो अलग अलग हो सकते हैं। बहरहाल, चुनाव के माहौल ने सबको मन्त्र मुग्ध किया हुआ है। अधिकतर का ध्यान भी इसी में लगा हुआ है।


रोज कहीं न कहीं रैली और सभाएं हो रही हैं। राजनीति के दिग्गज खूब भाषण दे रहे हैं। चुनावी सभा में भारी भीड़ देख नेताजी लोग गदगद हो रहे हैं। इतना गदगद हो रहे हैं कि गदहा भी अब गदगद महसूस करने लगा होगा। लोगों ने कभी सोचा भी न होगा कि सर्वगुण सम्पन्न कहे जा रहे इस मासूम जीव को भी चुनावी भाषणों में जगह दी जाएगी। पर ऐसा हुआ है। लोगों का भी इससे खूब मनोरंजन हुआ। जो लोग रैलियों में इन बातों को नहीं सुन पाए। टीवी और अखबारों ने ये खबर उनतक बिना देर किए ही पहुंचा दी।

बहरहाल, वोटर्स को रैलियों में थोक में लोक लुभावने वादे भी थमाए जा रहे हैं। जो हमेशा से ही होते आ रहा है। वादे पूरे हो या न हो ज्यादातर को ये याद भी नहीं रहता। वादे के सहारे ही रहने की आदत सी होती जा रही है। वहीं, चुनाव के चलते वो चेहरे भी खूब दिखने लगे हैं, जिनके पास आम लोगों के लिए कम ही समय रहता था। अब भला वक्त कहां से आ जाता है, समझने वाले तो समझ ही जाते होंगे। चुनाव के दौरान तो रैली शब्द भी खूब ट्रेंड में रहता है।

छुटभय्यों समेत नेतागीरी में पहला कदम रखने वालों को इन्ही दिनों में शुभ अवसर प्राप्त होते है, जब वह अपने साथ भीड़ जुटाकर अपना कद बढ़ाते हैं। नेताजी  लोगों को अभी वोट मांगने दीजिए। वोटर्स का भी निर्णय सामने आ ही जाएगा। कुछ दिन जिज्ञासा को शांत बनाएं रखें। निर्णय जो भी हो, चुनाव में हार जीत तो सदैव चलता ही रहेगा। सोचना ये है कि वोटर्स के दिन भी ऐसे ही वोट देकर न बीत जाएं। आशाएं भी पूरी होनी चाहिए। मंचों और लौडस्पीकर से निकले सभी वादे भी पूरे होने चाहिए।

बेरोजगारों को रोजगार मुहैया हो और आर्थिक असमानता की गहराती खाई भी भरे। सभी का बिना भेदभाव विकास हो और प्रगति के समान अवसर मिले। जनता जनार्दन के हित में कार्य हों। गरीब व कमजोर वर्ग सहित सभी लोगों को विकास की मुख्य धारा में लाया जाए। राजनीति ही एक ऐसा क्षेत्र है, जहां अभी भी कई कार्य होने की संभावनाएं बनी हुई हैं। सिर्फ भाषणबाजी ही नहीं, लोगों की आकांक्षाओं को भी पूरा करना कर्तव्य बनना चाहिए। वोटर्स भी वादों को सिर्फ याद न रखें, बल्कि इनपर अमल कराने की भी आदत डालें।

वोट तो अनिवार्य रूप से डालें ही। हर हाल में मतदान के लिए वक्त निकालें। अच्छे जनप्रतिनिधि का चयन करें। स्वयं के विवेक से अपना निर्णय लें। ना कि किसी के दबाव या लालच में। स्थितियों का ठीक से मूल्यांकन जरूर करें। सही जनप्रतिनिधि को अपना नेता बनाएं और उसी के लिए अपना कीमती वोट दें। वरना भाषणों में गदहा पचीसी तो चल ही रहा है। गलत निर्णय लिया तो कल को हम ही गधे साबित हो जाएंगे। और खेलने वाले गदहा पचीसी खेलकर अपने वारे न्यारे तो कर ही लेंगे। बस मनोरंजन के तौर पर इस प्रकार की बातों, बयानों और भाषणों का आनंद लीजिए, लेकिन वोट गम्भीरता से दीजिए।

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