S.Khan February 07, 2017
आज मार्केटिंग का दौर है। अच्छा ब्रांड, प्रचार प्रसार, विज्ञापन का बोलबाला है। लोगों की पसंद और जरूरतें विज्ञापन से काफी हद तक तय होने लगे हैं। बिना विज्ञापन के तो अच्छी क्वालिटी की चीज भी लोगों की पसंद नहीं बन पा रही है। आज हर चीज का नया नया ब्रांड सामने आ रहा है। शायद ही कोई वस्तु हो जिसका ब्रान्डिकरण न हुआ हो। पानी, दूध, अनाज, आटा, तेल और ऐसी तमाम चीजों के बाजार में दर्जनों ब्रांड हैं। पैकेट में भी ये आसानी से परचून की दुकानों में उपलब्ध रहती हैं। पर तैयार गर्मागर्म चाय आज भी किसी ब्रांड से कहीं शायद ही बिकती हो। जबकि इसके शौकीनों की तादात सबसे ज्यादा ही लगती है। चाय बिना ब्रांड, बिना प्रचार सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। आलम ये है कि चाय के नाम पर गीत भी रच दिए गए हैं। एक गरम चाय का प्याला हो... गीत इसका उदाहरण है। तब चाय की तरह यह भी काफी लोकप्रिय हुआ।
कड़क चाय, काली चाय
सभी चीजों में बदलाओ होता जा रहा है। बस नहीं बदला तो बनी बनाई चाय। अभी भी छोटे से लेकर बड़े शहरों में तैयार चाय का स्वरुप वैसा ही है। इनका कोई ब्रांड नहीं होता। बस कड़क चाय, अदरक वाली चाय, इलायची वाली चाय, सादा चाय, नीबू वाली चाय, काली चाय आदि नामों से इनका संबोधन किया जाता है। बड़े होटलों से लेकर गुमटी तक पर यह पेय आसानी से मिलता है। छोटे शहरों में तो अभी भी 5 रुपए में कड़क चाय मिल जाती है।
चाय की दुकानें गुलजार
कस्बों में तो इसी चाय की वजह से रात में थोड़ी चहल पहल भी रहती है। छोटे नगरों में दुकानें सूरज ढलने के बाद से बंद होने लगती हैं। अंधेरा घिरते घिरते सन्नाटा पसरने लगता है। तब भी चाय की गुमटियों में अंगीठी धधकती रहती है। केतली में चाय उबलता रहता है। चाय के शौकीन सन्नाटे को अनदेखा करते हुए खिंचे चले आते हैं। चारों और भले ही सून सियापा हो चाय की दुकानों पर भीड़ जरूर दिखती है।
हंसी मजाक और चर्चा भी
चाय की दुकानों पर चाय पीने के अलावा बातें भी जमकर चला करती हैं। कई दफा तो वर्तमान हालातों, विभिन मुद्दों, नीति, कूटनीति, राजनीतिक, आर्थिक आदि मामलों को लेकर गम्भीर चर्चा भी सुनाई पड़ती हैं। हंसी मजाक भी चलता रहता है। ये चाय का ही कमाल है, जहां लोग सभी भेद भूलकर चुस्कियों का लुत्फ़ लेते हैं। यहां चाय ग्लास में पिएं या मिट्टी के कुल्हड़ में, इसका कोई ब्रांड नहीं होता। बस गर्मागर्म चाय होनी चाहिए।
चाय ही पहली पसंद
अलसा रहें हो तो भी चाय की याद ही आती है। किसी का स्वागत करना हो तो भी चाय पहली पसंद होती है। किसी भी शहर, मार्ग, गांव में यह पेय सुलभ है। भला हो आज तक इसका बाजारीकरण नहीं हुआ। वरना चाय पत्ती की तरह इसके भी कई ब्रांडों के विज्ञापन जगह जगह देखने पड़ते। शायद इससे सस्ती चाय महंगी भी हो जाती। कोई इस ब्रांड को पसन्द करता तो कोई उस ब्रांड को। फिलहाल तो चाय बिना ब्रांड के ही ब्रांडेड है। आज भी एक जैसी है। हां अलग जगह इनके नाम अलग हो सकते है। बनाने में कुछ नयापन भी हो सकता है।
चाय बिना लगता अधूरा
अब तो दिन में दो तीन बार चाय नहीं मिले तो सब अधूरा सा महसूस होता है। चाय भी अब हमारे जीवन का एक हिस्सा सा बन गया है। सुबह की शुरुआत चाय से तो शाम को भी चाय की आदत अब आम बात हो गई है। चाय अब इतना आम हो गया है कि किसी से नाराज होने पर ये भी कह दिया जाता है कि उसने तो चाय के लिए भी नहीं पूछा।
सफर का साथी चाय
सफर का सबसे अच्छा दोस्त भी चाय ही साबित हो रहा है। सफर में बोर हो रहे हों या कुछ देर आराम करना हो तो भी चाय की याद सबसे पहले आती है। ट्रेन की सफर तो मानो बिना चाय के अधूरी ही रहती है। कितनी भी रात हो छोटे से स्टेशन पर भी चाय जरूर मिलेगा। भले कोई और चीज नहीं मिले। भोर होते होते तो चाय-चाय की कर्कश आवाज आपको गहरी नींद से भी उठा सकता हैं। कई तो इन आवाजों से मन ही मन खिसिया भी जाते हैं। पर खिसियाहट व्यक्त नहीं करते। क्योंकि चाय तो इनके लिए भी खासी प्यारी ही होती है।
चाय के संदेश को समझें
अब तो दिन की शरुआत इस गर्म पेय से ही होने का प्रचलन बढ़ा है। अब तो चाय हमेशा सुर्खियों में भी रहने लगा है। बिना कोई ख़ास बदलाव लाए आज भी चाय पेय पदार्थों की दौड़ में अव्वल ही लगती है। अन्य ब्रांडेड पेय पदार्थों की तुलना में इसकी डिमांड भी ज्यादा ही है। आज कोई चीज ऐसी दिखती तो है, जो पैकेट में पैक होकर नहीं बिकती। तो दोस्तों चाय की चुस्कियों का आनंद लें और इसके सन्देश को भी समझने का प्रयास करें।


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